आस्था का प्रतीक हनुमान सेतु मंदिर
July 21, 2019 • अशोक द्विवेदी

आस्था का प्रतीक हनुमान सेतु मंदिर

             लखनऊ का हनुमान सेतु मदिर और बाबा नीव करोरी का आश्रम खुद में मान्यता, मनौती और आस्था का ऐसा इतिहास समेटे है कि मंगलवार को शाम की महाआरती में भक्तों को बजरंगबली का जयकारा सड़क से लगाना पड़ता है। बाबा और बजरंगबली की मान्यता के चलते अक्सर मंगलवार की शाम की महाआरती में दरबार इतना भर जाता है कि कतारें सड़क तक चली जाती हैं। दिन भर मंदिर के सामने से गुजरने वाला शायद ही कोई शहरी हो जो गुजरने के दौरान सब कुछ भूल कर बजरंगबली और बाबा को नमन न करता हो। यही तो महिमा है मंदिर और बाबा नीब करोरी आश्रम की।
             भक्तों के लिए बाबा नीब करोरी पश्चिमी देशों में भारत की विरासत की अगुवाई करते थे। उनके आश्रमों में जहां न केवल देशवासियों को, बल्कि पूरी दुनिया को खुशहाल बनने का मार्ग मिलता है। प्राचीन सनातन धर्म की संस्कृति का भी प्रचार प्रसार होता है। हमेशा एक कम्बल ओढ़े रहने वाले बाबा की छवि का आशीर्वाद लेने के लिए भारतीयों के साथ बड़ी-बड़ी विदेशी हस्तियां भी उनके बनवाये मंदिरों-आश्रम पर आती हैं। उन्हीं में से एक है नगर का 50 साल पुराना हनुमान सेतु मंदिर व बाबा नीब करोरी आश्रम। बाबा नीब करोरी की प्रेरणा से बने इस मंदिर की बड़ी मान्यता है। भक्तों का मानना है कि बजरंग बली सभी की मनोकामना पूरी करते हैं। मंदिर के मुख्य बड़े पुजारी भगवान सिंह बिष्ट ने बताया कि गोमती का मौजूदा हनुमान सेतु पुल बनने और हनुमान सेतु मन्दिर की स्थापना में आपस में संबंध है।


             पुजारी के मुताबिक बात 50 के दशक के अंतिम वर्षों की है। बाबा यहां नदी के किनारे आश्रम बनाकर रहना शुरू कर चुके थे और अक्सर यहां आया जाया करते थे। 1960 की भयंकर बाढ़ में प्रशासन ने बाढ़ के बाद बाबा की तपोस्थली व पुराने मन्दिर के पास रहने वालों से स्थान छोड़ने को कहा। ये भी बताया गया कि मौजूदा पुराना सेतु (तब का मंकी ब्रिज, क्योंकि उस पर बहुत संख्या में वानरों का वास था) भी बाढ़ में धोखा दे सकता है। खतरे को देखते हुए सभी ने जमीन खाली कर दी, लेकिन बाबा नीब करोरी कहीं नहीं गये। समय बीतता गया, सरकार ने 62-63 में नये पुल का निर्माण शुरू करा दिया, लेकिन बंबई के बिल्डर को नई दिक्कतों का सामना करना पड़ा। पुल के पिलर आये दिन बह जाते। सामान और मशीनें बह जाती। थक हार कर एक दिन उन लोगों ने जब बाबा से मुलाकात की और आशीर्वाद मांगा तो बाबा ने कहा कि 'हनुमान जी ने समुद्र में इतना बड़ा सेतु बनवा दिया, उनका मंदिर बनवा दो, आश्रम बनवा दो तो तुम्हारा सेतु भी बन जायेगा...'।
             आशीर्वाद पाकर 63-64 में मंदिर और पुल का बनना शुरू हुआ। 26 जनवरी 1967 को मंदिर बनकर भक्तों के लिये खुला। अगले ही महीने फरवरी में बसंत पंचमी में पुल जनता के लिये खुलकर तैयार हो गया। बाबा का आश्रम भी वहीं आ गया। आज उनकी प्रतिमा भी लगी है। आश्रम के बाद बाबा का आना-जाना लगातार लखनऊ में लगा रहा। हर साल 26 जनवरी को हनुमान सेतु मंदिर व आश्रम का स्थापना महोत्सव भंडारा आयोजन धूमधाम से मनाया जाता है।

मनौती के लिए चिट्ठी लिखकर अर्जी लगाते हैं भक्त

             50 साल पूरे कर चुका बाबा नीब करोरी आश्रम और मंदिर की मान्यता इस कदर है कि यहां आज भी दूर दराज से चिट्ठियां लिखकर लोग मनौतियां मानते हैं। पुजारियों के मुताबिक जेठ महीने, परीक्षा के समय और सहालगों के समय चिट्ठियों की बाढ़ सी आ जाती है। आज भी बाबा के श्रृंगार (वस्त्र, पुष्प, बिजली, चोला) के लिये 6-7 महीने की एडवांस बुकिंग रहती है। शहर के तमाम नौकरशाह, कारोबारी व जनप्रतिनिधि यहां मंगलवार को कतारों में दर्शन करते देखे जा सकते हैं।

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अशोक द्विवेदी, लखनऊ