कृपा की किरण
January 29, 2019 • सत्यवती सिंह

कृपा की किरण

गुरूवर की कृपा, रघुवर की कृपा
हनुमत की कृपा, सब एक ही है ।
कृपा की मिलें, गर एक किरण
जीवन की घटा, फिर नेक ही है ।।
              बस एक बार, तज आ जा तू
              सब भूल-भुलैया, भव निधि की ।
              शरणागत की मधु, चख तो जरा
              जीवन बगिया, खिल जाय तेरी ।।
मत सोच कहाँ, कब, क्या होगा?
बस नाम प्रभु का, लेता चल ।
मन मंदिर के पट, खोल जरा
नित झाड़ बुहार, सँवार उसे ।।
              क्यों फिरता ह,ै मारा-मारा
              ऊपर की खोल, उतार जरा ।
              अन्तरतम में सबके सांई
              तू उसकी छटा, निहार जरा ।।
तेरा संशय, मिट जायेगा
बिछुड़ा सांई,मिल जायेगा ।
जिसे खोज रहा है, जन्मों से
पल भर में, किनारा पायेगा ।।
              सूकर-कूकर-माछर मांखी
              जलचर-थलचर, नभचर पाखी ।
              हर कण में, बसेरा उसका है
              मन, मान सके तो मान उसे ।।
एक बार समझ, गर आ जाए
तू जाग सके, तो जाग अरे!
एक पल में, किनारा मिल जाए
तू थाम सके, तो थाम उसे ।।
              आजा आ जा, इस पार जरा
              शरणागत हो पतवार पकड़ ।
              मन का विश्वास जगा प्यारे
              तू भव-सागर से पार उतर ।।
किरपा, किरपा, किरपा, किरपा
किरपा के लिए मत रोया कर ।
प्रभु की कृपा, नित बरस रही
तू जान, मान और थाम उसे ।।

सत्यवती सिंह
इन्दिरा नगर, लखनऊ