जब अमरनाथ यात्रा में बाबाजी ने खुद पिलाई चाय
September 20, 2019 • विरेन भाई मेहता

जब अमरनाथ यात्रा में बाबाजी ने खुद पिलाई चाय


अमरनाथ बाबा गुफा में पावन दर्शनों के बाद मन अति संतुष्ट हो गया। पिछले अनुभव से ज्ञात था कि दिन के समय दर्शनार्थी आसानी से दर्शन लाभ से वंचित रह जाते हैं, इसलिए तय किया कि रात के समय ही दर्शनलाभ का अवसर प्राप्त कर सकूं। मैंने अकेले ही रात के समय अमरनाथ बाबा की गुफा की ओर प्रस्थान किया। स्नान के पश्चात् पूजा सामग्री के साथ गुफा में प्रवेश करने का अवसर भी मिल गया। यह सुखद अनुभव था, ऐसा लगा कि रात को बाबा अमरनाथ मेरी ही प्रतीक्षा कर रहे थे। क्योंकि रात्रि के समय शायद कोई पूजा करने नहीं आता होगा। गुफा में मेरे और अमरनाथ बाबा के सिवा कोई नही था। मैंने दो घन्टे गुफा में अमरनाथ बाबा की पूजा व ध्यान किया। ऐसा लगा कि जैसे आज बाबा ने मेरी बातें सुनी। ये अनुभव ऐसा था कि शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता हूँ। ऐसा लगा कि शायद ये सौभाग्य दूसरी बार प्राप्त नहीं होगा। समय देखा तो रात्रि के 2ः30 बजे थे। पूजा करके अपने टेन्ट में जाने के लिए गुफा से नीचे की ओर बढा। 


 मध्यरात्रि का समय, पहाड़ी जंगल का रास्ता, रात्रि का अंधेरा दुविधा का कारण बन रहा था। फिर भी सद्विचारों की श्रृंखला और तारतम्यता के साथ आगे बढ़ा जा रहा था। मन में सोच रहा था कि जब दर्शन हेतु गया तब खाली था और बाहर निकला तब बहुत भरा था। टेन्ट में अन्य साथियों की जिम्मेदारी भी पूर्ण रूप से मेरे ऊपर ही थी। इस यात्रा के लिए अन्य साथी मेरी मार्गदर्शिता पर आधारित थे। मैं ही उनका तीर्थयात्रा मार्गदर्शक और गाइड था। पिछले कई वर्षों से सूरत, अहमदाबाद मुंबई, बड़ौदा और गुजरात के विभिन्न शहर ''टूर एण्ड ट्रेवल्स टूरिज्म'' के अन्तर्गत मैंने भारत में तीर्थयात्रा का सफल गाईड का काम किया। इस बार का अनुभव और आध्यात्मिक महसूस हो रहा था। बचपन से ही संयुक्त परिवार में माता-पिता, दादा-दादी, चाचा-चाची से मिले संस्कार में प्रभु के प्रति अटूट विश्वास और प्रेम की सीख जैसे व्यवहार का अभिन्न हिस्सा हो गया हो। हनुमान चालीसा, सुन्दरकाण्ड, संध्या पूजा, यज्ञ और चाचाजी (जो मेरे सद्गुरु है) के साथ कथाओं में जाना, भागवत, श्रीराम कथा, सत्संग धार्मिक चर्चा में जाना और आनंद लेना मेरे जीवन और मस्तिष्क में आत्मसात हो जा रहा था। इन सभी संस्कारों ने ईश्वर और आध्यात्मिकता के अति निकट कर पावन कर दिया।


 अपने ही विचारों की धुन में संकरे पहाड़ी अंधेरे रास्तों से हेता हुआ चला जा रहा था। चलते-चलते ठंड में चाय पीने का मन होने लगा। अब जंगल में चाय कहां मिलती?रास्ता खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। कहीं रास्ता भूल तो नहीं गया? यह विचार आते ही मैं सावधान हो गया। शायद मैं पथ भ्रमित हो रहा था। अब क्या करें? तभी अंधरे रास्ते में महसूस किया कि पीछे कोई चल रहा है। पलट कर देखा तो अंधेरे में कोई वृद्ध कम्बल ओढे़ आ रहा था। मैं डर गया। अजनबी समझ कर मैंने बात नहीं की। चुपचाप डरा हुआ चलता रहा। वृद्ध ने स्वयं बात की और बताया कि' तुम गलत रास्ते से जा रहे हो।' ये रास्ता गलत है। तुम्हारे साथी जहाँ टेंट में है, वह दूसरा मार्ग है।
और उन्होनें सही मार्ग की ओर संकेत किया और पूछा 'बेटा चाय पिओगे? 'मैं आश्चर्यचकित था, मुझे सही में चाय पीने की तीव्र इच्छा भी थी। पर जंगल में बिना किसी साधन के चाय की उम्मीद करना व्यर्थ था।फिर भी मैंने चाय पीने की इच्छा जाहिर की। उन्होंने अपने साथ लाये चाय बनाने के साधनों को एकत्रित किया। लकड़ी जलाने लिए माचिस से आग जलाई। चाय बन गयी। एक नारियल के खप्पर में चाय डाल कर मेरी ओर बढ़ाई। आग के उजाले में उनके तेजस्वी चेहरे को देखातो मैं निःशब्द रह गया। तेजस्वी मुख, करुणा भरी आंखे और एक कंबल से ढाका तन। मेरी आखों में आंसू आ गए। वृद्ध की आंखों में इतनी करुणा थी कि वर्णन नहीं कर सकता। मैं कुछ पूछ न सका। लगा कि सब उनको पता है वह मुझे कई सालों से जानते हैं।  प्रेमपूर्ण व्यक्तित्व, मोहक मुस्कान और उनका अपनापन .....मैं जैसे उनके तिलिस्म के मोहपाश में बंधा जा रहा था। अब मैं मोहभ्रमित सा उनकी बनाई चाय की चुस्कियां ले रहा था। फिर मेरे मन में एक क्षण बुरा विचार आया कि कही कोई लूटपाट का इरादा तो नहीं। फिर यह सोचकर तसल्ली कर ली कि मेरे पास तो कुछ है ही नहीं। चाय भी पी ली। अजब स्वाद था। मन के साथ आत्मा भी संतुष्ट हो गई। अचानक शांति का अनुभव हो रहा था। इतने कम सानिध्य में ही मन की नकारात्मकता जैस धुल-धुल कर मन से निकलती चली गयी। मन आशांवित सकारात्मकता से ऊर्जावान हो गया। आध्यात्मिक प्रेम की कोमलता से मन प्रखर हो उठा। उस वृद्ध व्यक्ति ने फिर थैले में अपना सामान रखा।
 उन्होंने पूछा, तुम क्या काम करते हो? मैंने कहा, टूर एण्ड ट्रैवेल्स कम्पनी में काम करता हूँ। यात्रियों को धार्मिक यात्रा स्थानों पर ले जाता हूँ। वृद्ध ने आदेशात्मक राय दी कि ''तुम कथा करो'' श्री राम कथा, श्री भगवत कथा, श्री शिव कथा, भगवान की कथा करो। मैंने संशय व्यक्त किया- 'कथा कैसे करुं? कौन सुनेगा? कौन प्रबंध करेगा?' उस अजनबी व्यक्तित्व ने ज़ोर देकर समझाया कि तुम अध्ययन शुरू करो, प्रबंध स्वयं होता रहेगा। दो बार कहा कि' तुम कथा करो! कथा करो! 'मैंने ज्यादा नहीं पूछा। हम लोग चलते ही रहे। मन में सोच रहा था कि इस प्रभावशाली व्यक्ति को कैसे पता कि मैं पंडित हूँ? थोड़ी देर में मैनें महसूस किया कि वह साथ नहीं हैं। मैंने पलट कर देखा तो पीछे कोई नहीं था। मैं ढूंढता रह गया पर उन्हें नहीं ढूंढ सका। अधूरे मन से वापस टेन्ट में आ गया। सभी यात्रियों को अमरनाथ दर्शन के लिए जगाया और तब तक सुबह के लगभग चार बज गये थे। सभी यात्रियों के जाने के पश्चात मैं उस अजनबी व्यक्ति की तलाश में फिर चल पड़ा। परंतु कही भी उनका कोई पता नहीं चला। बस इतनी सी बात खटकती रही कि 'उनका आश्रय और पता भी नहीं पूछा। चरण स्पर्श भी नहीं किया। कितना मूर्ख और अविवेकी हूँ। 'उस व्यक्तित्व को मन मे लेकर यात्रा पूरी करके घर आया। सुबह-शाम उस वृद्ध व्यक्ति के बारे में सोचता रहा। उनके शब्द मेरे कान में गूंजने लगे 'कथा करो।' मैंने कथा का अध्ययन भी शुरू कर दिया। कई महीने बाद टी.वी. में न्यूज चैनल पर कार्यक्रम के दौरान ''नीब करौरी बाबा'' के बारे में बताया जा रहा था। उनको जब मैंने देखा चौक गया उनकी आकृति और कंबल की तुलना मैंने उस अजनबी वृद्ध से की जो अमरनाथ यात्रा के दौरान मिला था। मेरे मन में विश्वास हो गया कि प्रभु सचमुच मुझ जैसे भटके यात्री को सही मार्गदर्शन के लिए चाय रुपी ज्ञान अमृत देने ही आये थे और मैं पहचान न सका। फिर इन्टरनेट के माध्यम से बाबा के बारे में बहुत सी जानकारी एकत्रित करने के पश्चात इस निर्णय पर पहुंचा कि प्रभु ही मेरे पास आये थे। मैंने मन ही मन सदगुरु का चरणों में आभार व्यक्त किया कि आपकी कृपा से ही भक्ति भावना आयी।
 मैंने सद्गुरु के आदेश पर ट्रैवेल का जॉब छोड़कर कथा का प्रवचन आरंभ कर दिया और आज मेरे लिए आश्चर्य का विषय है कि जाने कैसे प्रभु किन माध्यमों के द्वारा मेरे कार्यों को स्वयं ही संचालित करते है। कथाओं में व्यासपीठ पर हमेशा बाबाजी और हनुमानजी और सद्गुरू की तस्वीर सम्मुख रखता हूँ। और महसूस करता हूँ कि वे मेरे बहुत ही नजदीक है। सद्गुरु, हनुमानजी और नीब करौरी बाबा का आशीर्वाद अब स्वयं ही मेरे जीवन को संचालित कर रहा है। अस्तित्व की पूर्णता उन्हीं के श्रीचरणों में समर्पित है। प्रभु का आशीर्वाद यूं ही सभी के जीवन को सदा संचालित करता रहे। 

अनुवादक : डा. कुसुम शर्मा

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विरेन भाई मेहता
कथाकार (गुजरात)
श्री मदभागवत, श्री रामकथा
मो. 9428824540