मर्यादित जीवन के पर्याय हैं हनुमानजी
August 1, 2019 • उमाशंकर मिश्र ‘व्यास’

मर्यादित जीवन के पर्याय हैं हनुमानजी

           श्री हनुमान जी के पीछे जो पवन नन्दन का परिचय है, उसका महत्व भौतिक उतना भले न दिखता हो जितना कि आध्यात्मिक है, पर पवन की विशेषता को इंद्र भूल जाता है और उसे सूर्य का महत्व ज्यादा समझ मे आया,  ऐसा क्यों? तो याद रखियेगा सूर्य का महत्व इंद्र इसलिए समझ पाया कि वह कुछ घण्टे ही दिखाई देता है जो अप्राप्य हो, दुर्लभ हो उसका महत्व ज्यादा समझ मे आता है। परंतु पवन तो चौबीसों घण्टे सुलभ है, सुलभ वस्तु का दाम होता ही नही। संसार मे सूर्य के द्वारा भी सेवा होती है, पृथ्वी और जल के द्वारा भी सेवा प्राप्त है पर सेवा की समग्रता और निरन्तरता जो पवन में है वह अन्य किसी मे आपको नही मिलेगी। सेवा धर्म  ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है और इसी की पूर्णता को सम्पादित करने के लिए हनुमान जी का अविर्भाव हुआ।


           बाल्यकाल में हनुमान जी सूर्य को खा लेते है, इंद्र उन पर वज्र का प्रहार करता है फलस्वरूप पवनदेव अपना  अवरोध कर लेते है। तब इंद्र को बोध होता है कि हमने जिस पर प्रहार किया यदि वह मृत हो जाये तो संसार की ही मृत्यु हो जाएगी। तब समस्त देवता अपनी त्रुटि को समझते हुए हनुमान जी को  आशीर्वाद प्रदान करते है कि देवताओं द्वारा प्रदत्त किसी अस्त्र-शस्त्र का प्रभाव तुम पर नही पड़ेगा। पर इससे हनुमान जी का अहंकार बढ़ता नही, हनुमान जी पर इंद्रजीत द्वारा ब्रह्मास्त्र के प्रयोग से हनुमान जी को मूर्छित होने की आवश्यकता नही थी, पर उन्हें लगा कि भले ही ब्रह्मा के आशीर्वाद से मै ब्रह्मास्त्र से मुक्त हूं पर यदि मैं मूर्छित नही हुआ तो ब्रह्मा की मर्यादा नष्ट हो जाएगी। आशीर्वाद मिलने का यह अर्थ नही कि मैं उनकी मर्यादा को ही नष्ट कर दूं, ऐसा चिंतन निरभिमानी श्री हनुमान जी ही कर सकते है। अशोक वाटिका में हनुमान जी मूर्छित होने का अभिनय करते हुए गिरते दिखाई पड़ते है पर यह गिरना भक्त का मेघनाद को बहुत महंगा पड़ा, हनुमान जी मेघनाद की सेना जिधर खड़ी थी उसी पर गिरे।
           हनुमानजी जब लंका की ओर जाते है, तो उन्हें सुरसा मिलती है। वह उनसे कहती है मुझे भूख लगी है और इसके साथ ही वह एक अनोखी बात कह उठती है क्या? बोली “आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह आहारा।“  देवताओं ने आज मुझे भोजन दिया है। उन्होंने मुझसे कहा कि मै तुम्हे खा लूँ। मै उन देवताओं की आज्ञा से ही तुम्हे खाने आई हूं। बात बड़ी अटपटी मालूम पड़ती है। सिंहिका और लंकिनी हनुमान जी को खाने की कोशिश करे, रावण की आज्ञा से हनुमानजी को खाने की चेष्टा की जाए, यह बात तो समझ मे आती है पर सुरसा देवताओं द्वारा भेजी जाकर हनुमान जी को खाने का प्रयास करे, यह बात समझ मे नही आती इसका रहस्य क्या है?
           हनुमान जी का संकेत यह था कि जब कोई दुर्गुणी व्यक्ति भक्त को गिराने का संकल्प करता है तो भले ही भक्त गिरता हुआ दिखाई दे पर विनाश तो दुर्गुणों का ही होता है। भक्त को कोई आघात या चोट नही लगती क्योकि वह वस्तुतः ईश्वर के प्रेम से, ईश्वर की शक्ति से अनुप्राणित होता है।
परितिहु बार कटकु संघारा।
           जीवन मे हम तीन प्रकार की प्रवित्तियों का खेल देखते है- सत्वमयी, रजोमयी एवं तमोमयी। इन तीनो का प्रतिनिधित्व क्रमशः सुरसा, लंकिनी और सिंहिका इन तीन नारी पात्रो द्वारा किया जाता है। यह तो हममें से अधिकांश जानते है कि रजोगुणी और तमोगुणी प्रवृत्तियाँ व्यक्ति का विनाश कर देती है, पर यह नही जानते कि सत्वगुणी प्रवर्ति भी उसके विनाश का कारण बन सकती है। सुरसा श्रेष्ठ कार्य, सत्वगुणी कार्य का प्रतिनिधित्व करती है। तो क्या सत्वगुणी कार्य व्यक्ति को विनष्ट नही करते? यह सत्वमयी प्रवृत्ति  जिससे हम श्रेष्ठ कार्य करते है, परोपकार और सेवा कार्य करते है, धर्म का कार्य करते है, उस व्यक्ति के पतन का कारण बन सकती है जो कार्य करते हुए सावधान नही रहता। जब व्यक्ति रजोमयी और तमोगुणी प्रवर्त्तियो से घिरा रहता है तो उसका सावधान रहना सरल है, पर यदि वह सत्वमयी प्रव्रत्ति से घिरा हुआ है तो उसके असावधान रहने का भय बना रहता है। तात्पर्य यह है कि हमे अपनी सत्वमयी प्रवृत्ति के प्रति अधिक सजग और सचेत होना चाहिए कि कही वह कि कही वह हमारे अहंकार को उभाड़कर हमारा भच्छन न कर ले।
           इस प्रकार हनुमानजी का जो पावन चरित्र है वह ईश्वर तत्व को हमारे समच्छ उपस्थित करता है कि जीवन की भूख को शांत करने का सच्चा उपाय क्या है उनके जन्म और जीवन  की जो अलौकिक गाथा है उससे यह संकेत हंमे पग-पग पर प्राप्त होता है कि जीवन मे सेवा-धर्म की सत्य औऱ प्रेम की प्रतिष्ठा कैसे की जाए तथा दुर्गुण दुर्विचारो पर कैसे विजय प्राप्त की जाए। इस सबके साथ जो महत्व की बात है कि जो उनके जीवन मे प्रदर्शित होता है वह यह है कि किसी भी कार्य के पीछे उनके अंतःकरण में अहंकार का लेश भी नही है। उनके चरित्र का यही गौरवपूर्ण पच्छ है और इसका प्रतीतात्मक संकेत हंमे “ श्री रामचरितमानस“ में सर्वत्र प्राप्त होता है। जय सियाराम। जासु नाम भव भेषज हरण घोर त्रय शूल। सो कृपालु मोहि तो पर सदा रहहि अनुकूल।