मोर अहार जहाँ लगि चोरा
January 30, 2019 • Hanumat Kripa

मोर अहार जहाँ लगि चोरा 

 

‘‘जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा । 
मोर अहार जहाँ लगि चोरा ।।’’
‘‘मुठिका एक महा कपि हनी । 
रुधिर बमत धरनी ढनमनी ।।’’
- अरे मूर्ख ! तू मुझे जाने बिना ही चल दिया - मैं चोरों को ही अपना आहार मानती हूँ। तू भी चोरों की तरह नगर में घुस रहा है। ‘‘जहाँ लगि’’ अर्थात जहाँ भी चोर हैं, उन्हें मैं खा जाती हूँ। हनुमानजी ने तुरन्त एक घूँसा उसे जड़ दिया। वह खून का वमन करती गिर पड़ी। स्त्री का सम्मान करने के पश्चात भी हनुमानजी ने ऐसा क्यों किया? कारण था लंकिनी का झूठ बोलना। सबसे बड़ा चोर ‘स्त्री’ ‘‘सीता का ही हरणकर्ता’’ तो स्वयं उसका स्वामी - राजा - रावण ही था - और वह स्वयं को कर्तव्यमूर्ति बताती कह रही थी ‘‘मोर अहार जहाँ लगि चोरा’’ उसकी तो रक्षा कर रही थी वह - अधर्म - अनीति - अनाचार के पक्ष में रहने पर स्त्री हो या पुरुष - हनुमानजी कुपित होते ही हैं।
लंकिनी अपने को सम्हाल कर खड़ी हुई बोली कि जब दशानन को ब्रह्माजी ने वरदान दिया था - तो मैंने पूछा था उनसे कि मेरे लिये क्या आदेश है। क्या मुझे कल्पपर्यन्त इन निशाचरों की सेवा में रहना पडे़गा तब उन्होंने ही बताया था कि जब किसी बानर के मारने से तुम व्याकुल हो जाओगी - तब समझ लेना कि राक्षसों का अन्त निकट आ गया है। अर्थात सृष्टि के सभी कार्य पूर्व नियोजित होते हैं ब्रह्माजी लंकिनी को बता चुके हैं तो संपातीजी को चन्द्रमा मुनि ‘रामावतार’ के विषय में बता चुके थे -