रामभक्त हनुमान की महिमा
January 30, 2019 • सत्यवती सिंह

रामभक्त हनुमान की महिमा


रामभक्त हनुमान की महिमा अनन्त है। इनके गुणों की चर्चा और उसका गान हम जैसे अल्पमति वाले वर्णन नहीं कर सकते। जब माता कैकेयी के वचन का पालन करके प्रभु श्रीराम माता जानकी और शेषावतार लक्ष्मण के साथ 14 वर्ष के लिए वन गये, तो वहाँ लंका के राजा रावण द्वारा माता जानकी का हरण हो जाता है। श्रीराम अनुज लक्ष्मण के साथ सीता की खोज में वन-वन भटक रहे थे। जंगल में वे दोनों विलाप करते हुए पशु-पक्षी, भमरों एवं मृगों से सीताजी का पता पूछते हैं-
‘‘हे खगमृग हे मधुकर श्रेनी ।
तुम देखी सीता मृगनयनी ।।
सीताजी का पता लगाते हुए वे दोनों भाई शबरी के आश्रम पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने शबरी के झूठे बेर खाये। भगवान हमेशा भक्तों का भाव देखते हैं। शबरी ने राम को पंपापुर में सुग्रीव का पता बताया और कहा कि वे जानकी को खोजने में आपकी सहायता करेंगें। सुग्रीव भाई बालि के डर से मित्रों सहित त्राष्टमूक पर्वत पर छिपकर रहते थे। दोनों भाइयों को पर्वत की ओर आता देख सुग्रीव भयभीत हो गये। कहीं बालि ने दोनों धनुषवाण धारण किये हुए वीरों को मुझे मारने के लिये भेजा है। सुग्रीव भयभीत होकर हनुमान से इन दोनो राजकुमारों का इधर आने को कारण जानने के लिए भेजा। सुग्रीव की आज्ञा से महाबली हनुमान वेश बदलकर ब्राह्मण रूप धारण किया और दोनो राजकुमारों के पास पहुँचकर पूँछते है। रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है।
‘‘को तुम श्यामल गौर सरीरा ।
क्षत्रिय रूप फिरहुँ बन बीरा ।।
कठिन भूमि कोमल पद गामी ।
कवन हेतु बिचरहुँ वन स्वामी ।।
तब भगवान श्रीराम ने उत्तर दिया।

‘‘कोसलेस दशरथ के जाये ।
हम पितु वचन मानि वन आये ।।
इहाँ हरी निसिचर वैदेही ।
विप्र फिरहु हम खोजत तेही ।।
तत्पश्चात श्रीराम जी ने उस ब्राह्मण का परिचय जानना चाहा। हनुमान ने राम के पूँछने पर कैसा सुन्दर उत्तर दिया है-
‘‘देह दृष्टया तु दासोडहं जीव दृष्टया त्वदंशकः।
वस्तुवस्त त्वमे वाहमिति मे निश्चिता मति।।
देह की दृष्टि से तो मैं आपका दास हूँ। जीव दृष्टि से मैं आपका अंश हूँ।, वस्तुतः प्रत्येक दृष्टि से मैं आपका ही हूँ। यह मेरी निश्चित मति है।
‘‘अतुलित बल धाम हेमशैलभदेहं
दनुजवन कृसानुं ज्ञानिनामग्रगण्यमं
सकल गुण निधांनमं वानाराणामधीशं
रघुपति प्रिय भक्त वातजातंनमामि’’
हनुमानजी ज्ञानी है, ज्ञानी तो स्वयं प्रेम स्वरूप होता ही है। क्योंकि अज्ञान का पर्दा हटते ही सर्वत्र प्रेममय भगवान के ही दर्शन होने लगते हैं। ब्रह्मानंद एवं प्रेमानंद एक ही बात है, केवल समझने का फेर है। एक ज्ञान का फल है और दूसरा भाव का। हनुमानजी के जैसी भगवत अनुभूति भला किसके पास हो सकती है।
हनुमानजी को राम नाम बहुत प्रिय है। वे जहाँ भी भगवान श्रीराम की कथा एवं भजन सुनते है वहाँ किसी न किसी रूप में अवश्य उपस्थित हो जाते है।

सत्यवती सिंह
इन्दिरा नगर, लखनऊ