राम नाम के सहारे भक्तों के बीच विराजमान रहते हनुमानजी
March 1, 2019 • स्वामी रामानन्द सरस्वती

राम नाम के सहारे भक्तों के बीच विराजमान रहते हनुमानजी

                भगवान राम की कमजोरी हैं भक्त तो हनुमान जी की कमजोरी हैं राम। जिस तरह भक्तों का कष्ट रामजी से नहीं देखा जाता उसी तरह रामजी की व्यथा हनुमान जी से नहीं सही जाती। भक्त कैसा है, कौन है, किस दशा में है, कहां से आया है, यह सब बड़े सरकार यानि भगवान राम देखते ही नहीं, उन्हें तो सिर्फ भक्त की वह पीड़ा दिखाई देती है जिसे उन्हें दूर करना होता है। रामजी जो सोचते हैं, केशरी नंदन उसे तुरंत पूरा कर देते हैं। यह बात स्वामी रामानंद सरस्वती ने भक्तों को राम कथा सुनाते हुए कही। स्वामीजी ने कहा कि रामजी के भक्तों पर हनुमानजी की कृपा होने की वजह है। जब श्रीराम अयोध्या से बैकुंठधाम जाने लगे तो अयोध्यावासी भी रामजी के साथ बैकुंठधाम चलने की जिद करने लगे। ब्रम्हाजी को आदेश हो गया कि जो अयोध्यावासी रामजी के साथ बैकुंठधाम जानाल् चाहते हैं उन्हें सशरीर जाने दिया जाय जाये। तभी भगवान राम ने देखा हनुमानजी उनके चरण पकड़े बैठे हैं, भाव विभोर होने की वजह से मुँह से आवाज नहीं निकल रही है, बस नेत्रों से अश्रु धारा बह रही है। रामजी ने हनुमानजी से कहा कि मेरी प्रार्थना है कि तुम मेरे साथ बैकुंठधाम न चलकर यहीं रहो और जो भक्त पृथ्वीलोक पर रहकर रामभक्ति में लीन हैं, उनका कल्याण करो। इस पर हनुमानजी ने विनत भाव से कहा मैं यहां रह तो जाऊंगा लेकिन मेरी भी शर्त है कि जब तक पृथ्वी पर राम का नाम रहेगा और रामकथा कही-सुनी जाती रहेगी, तभी तक राम नाम के सहारे भक्तों के बीच रह सकता हूं। यही वजह है कि आज भी जहाँ रामकथा, श्रीराम चरित मानस, सुंदर कांड का पाठ तथा रामनाम का जाप-कीर्तन आदि होता है, वहाँ हनुमानजी न सिर्फ विराजमान रहते हैं बल्कि रामनाम जप का आनंद लेते हुए आत्म विभोर होकर अश्रुधारा बहाते रहते हैं।

                स्वामीजी ने बताया कि संसार के लाखों संत-महंत व हनुमतभक्त रोज सुंदरकांड का पाठ ऐसे ही नहीं करते, उसका भी कारण है। भगवान राम को माता सीताजी और भक्त हनुमानजी बहुत प्रिय हैं, गोस्वामी तुलसीदास ने सुंदरकांड में इन दोनों के मनोभाव का बहुत सुंदर चित्रण किया है। हनुमानजी की भक्ति की पराकाष्ठा तो देखिए उन्होंने हमेशा भगवान राम व माता सीता के चरण ही देखे, कभी आँख उठाकर देखने को सोचा तक नहीं।

- स्वामी रामानन्द सरस्वती