संपादक की कलम से
July 2, 2019 • Naresh Dixit

संपादक की कलम से

राम नाम की महिमा अपार


राम नाम की महिमा अपार है। जिसने राम को जान लिया उसने सभी को जान लिया। प्रभु की कृपा से जब राम नाम लिखे पत्थर समुद्र में नहीं डूबे और रामसेतु बन गया तब राम का नाम लेने वाला भक्त भव सागर में कैसे फंस सकता है। भक्तशिरोमणि हनुमान जी ने तो राम नाम के सहारे ही हमेशा असंभव को संभव करते रहे और आज भी करते हैं। हनुमान जी के साक्षात अवतार बाबा नीब करोरी महाराज ने एक दुखी लड़की से पूछा कि उसे दुःख पसंद है या सुख। लड़की के जवाब नहीं देने पर गुरुदेव ने बताया था कि उन्हें दुःख पसंद है क्योंकि दुःख में प्रभु की ज्यादा याद आती है और वह अपने को प्रभु के करीब पाते हैं। कभी कभी तो कष्ट के दिनों में ईष्टदेव की पूजा इतनी बढ़ जाती है कि प्रभु को भक्त के पास अपने होने का एहसास तक कराना पड़ता है। मानव जीवन में पग-पग पर आने वाले संघर्ष व चुनौतियों का हिम्मत के साथ सामना हम तभी कर सकते हैं जब गुरु स्वरूप प्रभु हमारे साथ हों। जिंदगी के सारे कार्य प्रभु को समर्पित करके करें। इससे एक तो गलत कार्य की तरफ भटकाव नहीं होगा दूसरे बड़ा से बड़ा कार्य खुद कर लेने का अहंकार नहीं पनपेगा। संसार में जो भी जन्मा है उसकी आत्मा के साथ ही अंतरात्मा के रूप में परमात्मा भी मौजूद है। प्रभु को बाहर ढूंढ़ने की जरूरत ही नहीं, वह तो मन मंदिर में ही विराजमान है जो सामान्य तौर पर दिखाई नहीं देता। बस यहीं पर जिन्हें गुरु की कृपा मिल जाती है उनके मन मंदिर के द्वार खुल जाते हैं और भक्तों को प्रभु की निकटता का आभास होने लगता है। धीरे-धीरे ऐसे भक्तों का मन संसार से विरत होकर गुरु स्वरूप प्रभु में रमने लगता है। यह गृहस्थ संत के लिए परमानंद की अनुभूति का समय होता है। गुरु कृपा से ही भक्तों के ज्ञान चक्षु खुल जाते हैं और अभ्यास से ईष्टदेव से सीधे बातें भी होने लगती हैं। भक्त का ध्यानावस्था में मुस्कुराना, हँसना व रोने लगना इसका रोज दिखाई देने वाला प्रमाण है।
संत-महात्मा देवतुल्य होते हैं, उनका सम्मान सभी को करना चाहिए। लेकिन संत को समझना और परखना बेहद जरूरी है। जहाँ एक ओर सच्चा संत भक्त को प्रभु से जोड़ता है वहीं संत वेश में घूम रहे ढोंगी अपने कृत्यों से पूरे संत समाज को अपमानित करते हैं। आध्यात्म के जरिये प्रभु से तार जोड़ने के लिए एकांत में ध्यान लगाने का अभ्यास करना जरूरी है। ज़ब मन का भटकाव स्थिर होगा, इच्छाएं शांत होंगी तभी अन्तर्चक्षु खुलेंगे और प्रभु कृपा की अनुभूति शुरू होगी। भगवत चर्चा में रुचि बढ़ना, प्रवचन-कथा भागवत सुनने में मन लगना, अच्छा व प्रेरक साहित्य पढ़ने का मन करना, नियमित मंदिर जाकर प्रभु के चरणों में मत्था टेककर आशीर्वाद लेने की इच्छा जगना आनंदित जीवन के द्वार हैं। आप कैसा जीवन जीना चाहते हो, खुद तय करते हो। समाज में व्याप्त बुराइयों में लिप्त होकर जीवन जीने वालों की दुनिया अलग है। उन्हें न मान-अपमान की चिंता रहती है और न जेल में सजा काटने का डर। लेकिन जिन्हें जीवन से प्रेम है और पता है कि मानव जीवन में ही सत्कर्मों से प्रभु से निकटता संभव है, वह सब छोड़कर ईष्टदेव की शरण में आ जाते हैं।