संपादक की कलम से
September 10, 2019 • नरेश दीक्षित

संपादक की कलम से

प्रिय लागहुँ मोहि राम

राम नाम ऐसा महामंत्र है जिसका जाप गरीब-अमीर, शिक्षित-अशिक्षित व बाल-वृद्ध सब सहजता से कर सकते हैं। इस मंत्र को न याद करने की जरूरत है और न ही भूलने की आशंका। उठते-बैठते, चलते- फिरते, सोते-जगते या हँसते-गाते आप मन ही मन राम राम कहते हुए प्रभु से सामिप्य बनाये रख सकते हैं। तुलसी बाबा ने राम चरित मानस में साफ लिख दिया है 'कलयुग केवल नाम अधारा, सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा। जिसने राम को भुला दिया समझ लो उसने सबको भुला दिया। राम नाम कल्याणकारी तो है ही, दुःख-दारिद्र नाशक भी है। कलयुग में सद्गति पाने का एकमात्र साधन राम नाम का जाप है। इसी बात को कबीर दास ने दोहे में कह दी 'राम नाम की लूट है, लूट सके सो लूट। अंत काल पछतायेगा ज़ब प्राण जाएंगे छूट। हे प्रभु, ऐसा वरदान दो जैसे कामी पुरुष को स्त्री और लोभी व्यक्ति को धन प्यारा होता है उसी तरह राम का मनमोहक स्वरूप मुझे बेहद प्यारा लगने लगे।
 जीवन में विचारों का बड़ा महत्व है। अच्छे विचारों से ही सत्कर्म की प्रेरणा मिलती है। सत्कर्म से मन में आध्यात्म का बीजारोपण होता है। आध्यात्मिक वातावरण मिलते ही दैवीय शक्तियां आशीर्वाद देना शुरू कर देती हैं जिससे भक्त के जीवन में एकाएक बदलाव दिखाई देने लगता है। अकेले में बैठकर प्रभु से बातें करना, मंदिर में घंटों पूजा पाठ करना, मुस्कुराना, हँसना, रोना व आनंदित होना आदि ऐसे लक्षण हैं जो भक्त की प्रभु से नजदीकता को दर्शाता है। इस स्थिति को पाने के लिए घर-परिवार छोड़कर निर्जन स्थान पर जाने की जरूरत नहीं। घर में परिजनों के बीच रहते हुए भी गृहस्थ संत बना जा सकता है। गृहस्थ के लिए घर सबसे बड़ा मंदिर है। पारिवारिक जिम्मेदारी निभाते हुए सारे कार्य प्रभु को समर्पित कर निर्लिप्त भाव से जीवन जीना ही सच्चा मानव धर्म है।
 भगवान श्रीराम व हनुमान जी बचपन से ही मेरे आराध्य रहे हैं, आज भी हैं और आगे भी रहेंगे। जीवन में जो मांगा, प्रभु से ही माँगा। प्रभु की कृपा से ही अच्छे लोगों का साथ रहा। संकट के दौर में भी गलत व शार्टकट रास्ता कभी नहीं अपनाया। पत्रकार होने के बावजूद खानपान पर नियंत्रण रखा और जीवन के उत्तरार्ध में प्रभु ने अपनी शरण में लेकर मनपसंद कार्य सौंप दिया। अब भगवद् लीला से जुड़े संस्मरण, लेख व यात्रा वृत्तांत लिखना, सम्पादन करना व हनुमत कृपा पत्रिका में छापने में ही जीवन लगाना है। 60 साल के बाद ज़ब लोग घर में ऊबते हैं, उनके पास काम नहीं होता है, तब मेरे पास फालतू बात करने की फुर्सत नहीं। देशभर से श्री हनुमान जी व बाबा नीब करोरी महाराज के भक्तों के फोन आते हैं, उनसे बाबा जी के चमत्कारों की एक से बढ़कर एक जानकारी मिलती है। पढ़ने, लिखने व भगवद् चर्चा में दिन कब बीत गया, पता ही नहीं चलता है। न कोई चिंता न कोई फ़िक्र। प्राइमरी स्कूल में सुबह की वन्दना की यह पंक्ति आज मेरे जीवन का मूल मंत्र बन गया है ''जीवन का मैंने सौंप दिया सब भार तुम्हारे हाथों में, उत्थान पतन अब मेरा है, श्रीराम तुम्हारे हाथों में।''