संपादक की कलम से
January 29, 2019 • नरेश दीक्षित

संपादक की कलम से

प्रभु पद पंकज नावहिं शीशा...


          भगवान श्रीराम की महिमा अपार है। प्रभु के चरणों में शीश नवाकर जो सुख मिलता है, वह अलौकिक है। ’मन, कर्म, वचन चरण अनुरागी’ भाव से ओत्प्रोत होकर जीवन जीने वाले व्यक्ति के मन में कभी अनर्गल विचार आ ही नहीं सकते। सांसारिक माया मोह से अनासक्ति रखते हुए भक्ति भाव से किये गए कार्यों का फल निःसंदेह अच्छा होता है। यह बात सभी जानते हैं कि इस असार संसार में सब कुछ नाशवान है। कोई भी व्यक्ति या वस्तु हमेशा नहीं रहेगी। इसके बावजूद, जो जहाँ है लूटने में जुटा है। ठिकाना भले पलभर का न हो लेकिन इंतजाम सात पुश्तों का करने में लगे हैं। ज़ब तक ईश्वर के प्रति समर्पण नहीं होगा, अपेक्षित फल नहीं मिलने वाला। भगवान श्रीराम और भक्त शिरोमणि हनुमान जी को आराध्य मानने वाले भक्तजन सुन्दर कांड का पाठ जरूर करें, यदि कार्य की व्यस्तता है तो रोज न सही, सप्ताह में एक बार मंगलवार या शनिवार को तो नियमित पाठ करें ही। इससे जीवन में बड़ा बदलाव आएगा। मन में सकारात्मक विचार आएंगे और प्रभु के प्रति आस्था बढ़ेगी। देवी-देवताओं के प्रसंग पढ़ने में आनंद आने लगेगा। ईश्वर चर्चा व राम कथा अच्छी लगने लगेगी। भक्तजनों पर भगवत कृपा, रघुवर कृपा व हनुमत कृपा का श्रीआरम्भ इसी तरह होता है। यकीन मानिये ज़ब प्रभु राम व हनुमान जी में रमेगा तब आनंद ही आनंद होगा। जीवन में आने वाली परेशानियां व दिक्क़तें भी आसानी से अपना हल निकाल लेंगी। ज़ब प्रभु रचित प्रकृति अमीर-गरीब में भेदभाव नहीं करती तब खुद भगवान किसी के साथ अंतर कैसे कर सकते। जिस तरह पेड़ों में लगने वाले फल-फूल हों या फिर चाँद की चांदनी व सूरज की रोशनी अपनी मिठास, खुशबू, ठंडक और गर्मी देने में कभी दुराव नहीं करते। उसी प्रकार, प्रभु कृपा की अमृत वर्षा भी अनवरत होती रहती है और पात्रता के हिसाब से उसकी बूंदें भक्तों को मिलती रहती है। हे प्रभु, देना है तो भक्ति दो, भक्ति के सिवाय और कुछ नहीं चाहिए। 

कामिहि नारि पियारि जिमि, लोभिहिं प्रिय जिमि दाम।
तिमि रघुनाथ निरंतर, प्रिय लागहुँ मोहि राम।।

नरेश दीक्षित