हनुमान के हवालेराम की अयोध्या
January 30, 2019 • सुरेश चन्द्र दीक्षित

हनुमान के हवाले राम की अयोध्या

रघुवंशी राजाओं की राजधानी रही अयोध्या दुनिया की अनुपम नगरी है। जिस धरती पर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने जन्म लिया हो उसका कण-कण पावन व पवित्र होगा ही। किसी युग काल में अयोध्या अपने परिचय की मोहताज नहीं रही। महाराजा दिलीप से लेकर चक्रवर्ती सम्राट राजा दशरथ के शासनकाल तक आदर्श राज्य की राजधानी होने के नाते अयोध्या का खास महत्व रहा ही, बाद में रामनगरी के तौर पर इसे विश्वस्तर पर जो आध्यात्मिक ख्याति मिली वह शाश्वत हो गयी। अयोध्या होकर जाने वाला या अयोध्या के बाहर राजमार्ग पर आने-जाने वाला शायद ही कोई व्यक्ति होगा जिसका सिर इधर से निकलते समय श्रद्धा से खुद व खुद झुक न जाता हो। यह वह पावन नगरी है, जहां की सरयू नदी में देशभर के लाखों भक्त अपने पाप धुलने आते हैं। यहां राजा राम का राज्य था और आज भी है। अयोध्या आकर भगवान राम के दर्शन करने वाले हर श्रद्धालु को पहले भक्त शिरोमणि हनुमानजी के दर्शन करके अनुमति लेनी होती है। इसके लिए उन्हें हनुमानगढ़ी की 76 सीढ़ियां चढ़कर पवनपुत्र हनुमान की सबसे छोटी छह इंच की प्रतिमा के दर्शन कर पूजा-अर्चन करना होता है।
स्कन्धपुराण के अनुसार त्रेता युग में भगवान राम जब अपने लोक वापस जाने लगे तो अयोध्या का दायित्व हनुमानजी को सौंप कर गये। हनुमानजी का भगवान राम के रहते हुए रामकोट के आग्नेयकोण पर जिस स्थान पर प्रवास था, बाद में वही स्थान हनुमानगढ़ी के नाम से जाना गया। 18वीं शती की शुरूआत में अभय रामदास नाम के सिद्ध साधु को इस स्थल के जीर्णोद्धार का श्रेय दिया जाता है। अभय रामदास ने जब धुनी रमाई, तब यह स्थान मिट्टी का ऊँचा टीला मात्र रह गया था और उसी पर हनुमानजी की मूर्ति रखी थी।
मान्यता है कि नवाब शुजाउद्दौला का एक बेटा गंभीर रूप से बीमार पड़ा। चिकित्सकों ने उसे लाइलाज घोषित कर दिया। शुभचिंतकों की सलाह पर नवाब के बीमार बेटे को बाबा अभयरामदास के सम्मुख लाया गया। बाबा की दुआ से नवाब पुत्र चंगा हो गया। कृतज्ञता स्वरूप नवाब ने हनुमानगढ़ी को 52 बीघा जमीन की कर माफी दे दी और अपने दीवान नवलराय को आदेश दिया कि हनुमान जी का मंदिर निर्मित कराया जाये। आज किले के रूप में जो हनुमान जी का मंदिर है, उसे नवाब के आदेश पर ही निर्मित कराया गया था। इतना हीं नहीं, नवाब ने ताम्रपुत्र पर लिखकर यह घोषणा भी कर दी थी कि कभी भी इस मंदिर पर किसी राजा या शासक का अधिकार नहीं रहेगा और नहीं यहां के चढ़ावे से कोई टैक्स वसूल किया जायेगा।
हनुमानगढ़ी आने वाले भक्त कभी धर्म संप्रदाय व वर्ग-जाति में नहीं बंधे। यहां आने वाले भक्त ने जो हनुमानजी से मांगा उसकी मुराद पूरी हुई। यही वजह है कि अयोध्या की चौदहकोसी व पंचकोसी परिक्रमा हो या हनुमान जयंती, कार्तिक पूर्णिमा ज्येष्ठ के बड़े मंगल भारतीय नववर्ष सभी मौकों पर भक्तों का सरयू में स्नान करके हनुमानगढ़ी आने का तांता सुबह से रात तक टूटता नहीं है। श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने पर प्रशासन को पुलिस बल लगाना यहां के लिए आम बात है। हर मंगलवार व शनिवार को आसपास के हजारों लोग यहाँ हनुमानजी के दर्शन करने आते हैं।
अयोध्यावासियों का कहना है कि करीब 15 किलोमीटर क्षेत्र में फैली इस पवित्र नगरी में 70 हजार लोग रहते हैं। इनमें लगभग 15 हजार तो सिर्फ साधु संत ही हैं। यह दुनिया की अकेली नगरी है जहां छोटे बड़े मिलाकर कई हजार मंदिर हैं। श्रद्धा व आस्था का जनसैलाब अयोध्या में अक्सर देखने को मिलता है। अभी हाल में सम्पन्न ग्राम प्रधान व बीडीसी के चुनाव के बाद हजारों विजयी प्रत्याशियों ने हफ्तों हनुमानगढ़ी आकर पवनपुत्र हनुमान जी के दर्शन कर आशीर्वाद लिया और कई टन लड्डुओं का प्रसाद चढ़ाया। पूर्वांचल के दर्जनों जिलों के नौकरशाह हों या राजनेता हनुमानजी के दर्शन करके ही इधर से गुजरते हैं।

 


हनुमानगढ़ी में पुजारियों की तादाद करीब पांच सौ है। इसमें स्थायी कम, अस्थायी ज्यादा हैं। मंदिर की व्यवस्था के मुताबिक ज्यादातर पुजारियों का कार्यकाल एक बार में तीन माह का होता है। यह कम से कम 15 दिन व अधिकतम एक साल तक हो सकता है। मान्यता है कि हनुमान जी की सेवा में लगा पुजारी यों तो खुद कोई गलती नहीं करता है। लेकिन यदि जाने-अनजाने में उसमें चारित्रिक दोष आ जाता है तो वह खुद ही कोई बहाना बनाकर सेवाकार्य से अपने को अलग कर लेता है। यदि उसने ऐसा नहीं किया तो हनुमान जी उसे ऐसी सजा दे देते हैं, जिससे वह गलती करने लायक नहीं रह जाता। एक मान्यता यह भी है कि पुजारी चाहे जितना बड़ा पहलवान क्यां न हो लेकिन बिना हनुमान जी की विनती व आज्ञा के उनकी मूर्ति को उठाने की गलती नहीं करता। जब भी किसी पहलवान पुजारी ने अपने शारीरिक बल का अहंकार करके हनुमानगढ़ी में विराजमान मूर्ति को उठाना या हिलाना चाहा, वह ऐसा करने में असफल रहा। ऐसा दुःसाहस करने वाला पुजारी हफ्तेभर से ज्यादा जीवित भी नहीं रहा।
हनुमानगढ़ी के पुजारियों का तो यह भी कहना है कि हनुमानजी साक्षात यहां विराजमान रहते हैं। श्रद्धावान भक्तों को वह अलग-अलग रूपों में दर्शन भी देते हैं। कभी साधु के वेष में तो कभी वृद्ध-बालक के रूप में श्रद्धालुओं से मिलना उन्हें अच्छा लगता है।

सुरेश चन्द्र दीक्षित
चन्दूरा, बाराबंकी