अयोध्या, राम और हनुमान एक दूसरे के पूरक
March 21, 2020 • सियाराम पांडेय 'शांत' 

अयोध्या, राम और हनुमान एक दूसरे के पूरक


अयोध्या ब्रह्मा, विष्णु और महेश का समवेत स्वरूप है। रामनवमी और अयोध्या का एक दूसरे से घनिष्ठ रिश्ता है। चाहकर भी दोनों को एक दूसरे से विलग नहीं किया जा सकता है। अयोध्या में भगवान राम का अवतार भले ही त्रेता युग में हुआ था लेकिन इसकी पृष्ठभूमि अयोध्या को महाराज मनु की राजधानी बनाए जाने के पहले ही बन गई थी। भगवान विष्णु ने अपने चक्र और महर्षि वशिष्ठ के जरिए यह सुनिश्चित किया था कि धरती पर उनकी उपयुक्त अवतार कहां है? अयोध्या की लोकप्रियता की बड़ी वजह है कि मनु से ही मनुष्यों की उत्पत्ति हुई और मनु अयोध्या के राजा थे। जाहिर तौर पर अयोध्या सृष्टि की विस्तार भूमि है। काशी में अगर भगवान शिव और मां जगदंबा सर्वप्रथम प्रकट हुए थे और वहीं उन्होंने ब्रह्मा और विष्णु की उत्पत्ति की थी। वहां एक से अनेक होने की परिकल्पना जन्मी थी तो अयोध्या में बहुलता का सिद्धांत परवान चढ़ा था। वहां उसने अंतिम रूप लिया था। यही वजह भूमि है जहां गंगा का धरती पर लाने का सपना जगा था। उसके लिए भगीरथ प्रयास हुए थे। रघुवंश की कीर्तिलता यही फली—फूली।  
   अयोध्या सामान्य भूमि नहीं है। यह भगवान राम की अवतार भूमि है। लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न की जन्मभूमि है। इस भूमि पर भगवान राम ने अपना बचपन गुजारा है। पवित्र अयोध्या इच्वाकुवंशीय राजाओं की कर्मभूमि है। यहां पतित पावनी सरयू नदी हैं। इस कुल के आराध्य भगवान रंगनाथ हैं अर्थात भगवान शिव हैं। मतलब मनु से लेकर राम और उनके बाद के शासकों का इतिहास शिवभक्ति का है। शिव के एकादश रुद्रावतार हनुमान जी तो भगवान राम के जन्म से ही अयोध्या में विराजित हैं। राम के विष्णु लोक गमन के उपरांत भी वे आज तक अयोध्या की रक्षा कर रहे हैं।
   अयोध्या भारत का, खासकर उत्तर प्रदेश का अत्यंत प्राचीन धार्मिक नगर है। सरयू नदी के तट पर बसे इस शहर को  'कौशल देश' भी कहा जाता  रहा है। बौद्ध धर्म, हिन्दू धर्म और जैन धर्म का यह शाश्वत तीर्थक्षेत्र है।  अयोध्या की गणना सप्तपुरियों में है। 'अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका । वैशाली द्वारिका ध्येया पुरी तक्षशिला गया।' अयोध्या आगमन, सरयू स्नान, भगवान राम, हनुमान और सीता जी के दर्शन मात्र से  जीव का कल्याण हो जाता है। भगवान राम की स्वीकारोक्ति भी है कि ' सन्मुख होंहि जीव मोहिं जबहिं,जनम कोटि अघ नासहिं तबहिं। काशी के बासरे में कहा गया है कि 'काशी तव दर्शनात मुक्ति, गंगे तव मज्जनात मुक्ति' लेकिन कमोवेश यही बात अक्षरश: लागू आती है। यहां हनुमान जी अपने यहां दर्शन करने  आए हर रामभक्त की मुराद पूरी कर देते हैं। उसके कल्याण की राह प्रशस्त कर देते हैं। अयोध्या जितनी राम के नाम से जानी जाती है, उतनी हि वह हनुमान जी के लिए भी जानी जाती है। जिस शहर में जैन धर्म के 24 तीर्थकरों में से 5 तीर्थंकरों का जन्म हुआ हो, उसकी पावनता पर भला कब किसे क्या संदेह हो सकता है? जैन धर्म के पहले तीर्थंकर ऋषभनाथ, दूसरे तीर्थंकर अजितनाथ, चौथे तीर्थंकर अभिनंदननाथ ,पांचवें तीर्थंकर सुमतिनाथ और चौदहवें तीर्थंकर अनंतनाथ का अयोध्या की पावन धरा पर जन्म हुआ था। यह सभी इच्छ्वाकु और महाराज मनु के वंशज थे। भले ही यह शहर भगवान राम के अवतार के लिए जाना जाता है लेकिन यहां भगवान श्री हरि यानी विष्णु के सात और अवतार इसी अयोध्या भूमि पर हो चुके हैं। उन्हें सप्तहरि के नाम से जाना जाता है। सप्तहरि के उक्त अवतार देवताओं और ऋषि—मुनियों की घोर तपस्या की वजह से उन्हें वरदान देने के लिए हुआ था। इन सप्तहरियों के नाम भगवान गुप्तहरि, विष्णुहरि, चक्रहरि, पुण्यहरि, चन्द्रहरि, धर्महरि और बिल्वहरि हैं। अयोध्या में उनके पृथक—पृथक स्थान भी हैं।
 अयोध्या के केन्द्र में रामजी का प्राचीन स्थान है। इसे राघव जी के मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह एक मात्र ऐसा मंदिर है जहां भगवान राम के साथ सीता जी की मूर्ति नहीं लगी है।सरयू में स्नान के बाद राघव जी के दर्शन की परंपरा है। नागेश्वर नाथ मंदिर के बारे में मान्यता है कि इसे भगवान राम के पुत्र कुश ने बनवाया था। जनश्रुति है कि सरयू नदी में स्नान करते वक्त एक बार कुश का बाजूबंद  गिर गया था। वह एक नागकन्या को मिला और उसे कुश से प्रेम हो गया। वह शिवभक्त थी। कुश ने उसके लिए यह मंदिर बनवाया। इस मंदिर को विक्रमादित्य के काल के पहले का बताया जाता है। हनुमान गढ़ी के निकट स्थित कनक भवन अयोध्या का एक महत्वपूर्ण मंदिर है। माता कैकेयी ने यह भवन सीता जी को मुंह दिखाई में दिया था। ऐसी मान्यता है कि द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने इस मंदिर को बनवाया था और वहां  राम और सीता की मूर्ति स्थापित की थी। भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा है कि राम जन्म के अनेक कारण हैं। ' रामजन्म कर हेतू अनेका, परम विचित्र एक ते एका।' नारद जी ने भगवान विष्णु को शाप दिया। जालंधर की पत्नी वृंदा ने विष्णु को शाप दिया। 'एक कलप सुर देखि दुखारे। समर जलंधर सन सब हारे। संभु कीन्ह संग्राम अपारा। दनुज महाबल मरइ न मारा। परम सती असुराधिप नारी।तेहिं बल ताहि न जितहिं पुरारी। तासु श्राप हरि दीन्ह प्रमाना। कौतुकनिधि कृपाल भगवाना। तहां जलंधर रावन भयऊ। रन हति राम परम पद दयऊ।'
    शंखचूड़ की पत्नी तुलसी ने भगवान श्रीहरि को जो शाप दिया, उसे पूरा करने के लिए भी भगवान राम का अयोध्या में अवतार हुआ। रावण और कुंभकर्ण के अत्याचारों से, उसके एक लाख पुत्रों और सवा लाख नातियों के अत्याचार से कराहती धरती को निजात दिलाने के लिए भगवान राम ने अवतार लिया था। मानसकार ने लिखा है कि 'विप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।' भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा है कि ' जब जब होई धरम कै हानी।बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी। करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी। तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा,हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।'
  अयोध्या को अथर्ववेद में ईश्वर का नगर बताया गया है और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की गई है।स्कंदपुराण के अनुसार अयोध्या शब्द 'अ' कार ब्रह्मा, 'य' कार विष्णु है तथा 'ध' कार रुद्र का स्वरूप है। इसका शाब्दिक अर्थ है जहां पर युद्ध न हो। यह अवध का हिस्सा है। अवध अर्थात जहां किसी का वध न होता हो। अयोध्या का अर्थ है जिसे कोई युद्ध से जीत न सके। राम के समय यह नगर अवध नाम की राजधानी से जाना जाता था। बौद्ध ग्रन्थों में इन नगरों के पहले अयोध्या और बाद में साकेत कहा जाने लगा। अयोध्या और भगवान राम एक दूसरे के पूरक हैं। हनुमान जी  सेतु की भूमिका निभाते हैं। वे अयोध्या के रक्षक हैं। धर्म के रक्षक हैं। राम और हनुमान के बिना अयोध्या पूर्ण नहीं होती। अयोध्या को जानना है तो राम को जानना जरूरी है। राम को जानने के लिए हनुमान को जानना जरूरी है।
   अयोध्या के कण—कण में राम और हनुमान की अवस्थिति है। सरयू तो राममय है ही। इस सरयू में तो भगवान श्रीकृष्ण के भी स्नान करने का जिक्र मिलता है। भगवान राम ने कहा है कि 'अवधपुरी मम पुरी सुहावन। उत्तर दिसि सरयू बह पावन।' विडंबना इस बात की है कि राम जन्म भूमि विवाद में भगवान राम और अयोध्या के वजूद को ही नकारने की कोशिश हुई लेकिन तमाम धर्मग्रंथों में अयोध्या का जिक्र बहुत आदर से लिया गया है। जो धरती भगवान विष्णु के आठ अवतारों की गवाह है,उस धरती को नमन करने का, वहां निवास करने का मन किसका नहीं करेगा?

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सियाराम पांडेय 'शांत' 
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